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उल्फ़त मुकम्मल होगी

                
                                                         
                            तू आए या न आए इस राह पर कभी,
                                                                 
                            
हमें तो ख़ुद को तेरे नाम करना है।

न ख़बर तेरी, न कोई पैग़ाम आया,
फिर भी दिल ने तेरा इंतज़ार करना है,
लोग कहते हैं छोड़ दे अब ये रास्ता,
दिल कहता है… यहीं पर गुजर बसर करना है।

न मंज़िल का पता, न सफ़र की ख़बर,
फिर भी तेरा नाम लेकर चलना है,
तू मिले तो उलफ़त मुकम्मल होगी,
न मिले तो भी तेरा इंतज़ार करना है।
-रतन कुमार कैथवास
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
43 minutes ago

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