आँख में ठहरा हुआ था एक पूरा आसमान,
वो मगर पढ़ ही न पाए ये नमी क्या चीज़ है।
हमने हर लम्हा इशारों में उलफ़त लिख दी,
वो न समझे कि निगाहों की ज़बाँ क्या चीज़ है।
पास थे फिर भी हमारे दरमियाँ फ़ासले रहे,
वो न समझे कि ये दूरी की कमी क्या चीज़ है।
एक मुद्दत से उन्हें अपना बनाने की थी चाह,
वो न समझे इंतज़ारों की घड़ी क्या चीज़ है।
हम तो चुप थे कि कहीं रिश्ता न टूटे इस तरह,
वो समझ बैठे कि दिल में कुछ नहीं क्या चीज़ है।
काश इक बार मेरी ख़ामोशी सुन लेते वो,
फिर समझते कि उलफ़त की सदा क्या चीज़ है।
-रतन कुमार कैथवास
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X