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तेरी ख़लिश बाकी है

                
                                                         
                            ये आख़िरी नींद नहीं है मेरी,
                                                                 
                            
मन में अब भी कोई खलिश बाकी है,
कैसे समझाऊँ उन पुरानी यादों को,
तेरी नज़रों की तपिश बाकी है।

भूलने की बहुत कोशिश की हमने,
मगर दिल में वही गुज़ारिश बाकी है,
वक़्त गुज़रता गया ज़ख़्म भरते गए,
फिर भी तेरी, वही एक तस्वीर बाकी है।

मैंने यादों को समेटा भी बहुत,
पर तेरी आहट की सिफ़ारिश बाकी है,
रात ढलती है, नींद आती नहीं,
शायद आँखों में तेरी बारिश बाकी है।

किस तरह ख़ुद को समझाऊँ मैं अब,
तेरे जाने की कोई वजह बाकी है,
ये कहानी ख़त्म कहाँ हुई अभी,
मेरे हिस्से में, तेरी खलिश बाकी है।
-रतन कुमार कैथवास
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42 मिनट पहले

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