एक गाँव में दो लड़के रहते थे, दोनों की उम्र समान थी,
मगर दोनों की सोच में ज़मीन-आसमान की दूरी थी।
एक पहाड़ों के बीच पला, तो मुश्किलों से लड़ना सीख गया,
दूसरा मैदानों में पला, तो दूर तक देखना सीख गया।
किसी ने पूछा, आदमी का स्वभाव आखिर बनता कैसे है?
कौन उसे झुकना सिखाता है, कौन उसे तनना सिखाता है?
बुज़ुर्ग ने कहा, बेटा, सिर्फ़ किताबों से जवाब नहीं मिलता,
जिस भूगोल में इंसान पलता है, उसका असर उसके मिज़ाज पर भी दिखता है।
एक दिन दोनों ने मिलकर आसमान छूने का ख़्वाब देखा,
एक ने मुश्किलों को गिना, दूसरे ने मंज़िल का रास्ता देखा।
पहला बोला, यहाँ साधन नहीं, यहाँ अवसरों की कमी है,
दूसरा बोला, जहाँ इरादे ज़िंदा हों, वहाँ राहें भी बनी हैं।
वक़्त गुज़रा, एक ने हालात को अपनी तक़दीर मान लिया,
दूसरे ने हर ठोकर को आगे बढ़ने का पैग़ाम मान लिया।
एक की आँखों से ख़्वाब धीरे-धीरे उतरने लगे,
दूसरे के हौसले हर मुश्किल के सामने निखरने लगे।
तब बुज़ुर्ग ने दोनों को पास बुलाकर समझाया,
वहाँ का भूगोल, इन्सान का स्वभाव तय करता है।
सपनों की मौत किसी उम्र या मजबूरी से नहीं होती,
सपनों की आख़िरी साँस तब निकलती है, जब आँखें उन्हें देखना छोड़ देती हैं।
पहाड़ हो या मैदान, समंदर हो या रेगिस्तान,
इरादे बुलंद हों तो छोटा पड़ जाता है आसमान।
अपने माहौल से सीखो, मगर उसकी सीमा मत बन जाना,
सपने जब तक आँखों में ज़िंदा हैं, तब तक हार मत मानना।
-रतन कुमार कैथवास
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X