रास्ते तो ख़त्म होने का नाम ही न लेते हैं,
हम थे कि हर मोड़ से गुज़र चले।
जिसे समझा था कभी अपना सहारा हमने,
वही रिश्ते भी हमें तन्हा कर चले।
धूप इतनी थी कि, साए भी पिघलने लगे,
हम मगर, अपने ही साए से गुज़र चले।
ज़ख़्म मिलते रहे और हम मुस्कुराते रहे,
लोग समझे कि हम बेख़बर हो चले।
कौन समझेगा सफ़र की थकान को 'स्नेह',
हम तो मंज़िल की आस में ही बिखर चले।
-रतन कुमार कैथवास
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