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पूरी तरह पत्थर हुआ नहीं

                
                                                         
                            चराग़ों को बेवजह मत बुझाया करो,
                                                                 
                            
मेरे शहर में यूँ बार बार मत आया-जाया करो।

दिल में फिर से कोई उम्मीद जगती है,
तुम सामने आकर यूँ न बहलाया करो।

हमने बड़ी मुश्किल से संभाला है ख़ुद को,
पुरानी बातों को फिर से न दोहराया करो।

तुम्हारी आहट से मौसम बदलने लगता है,
यूँ खिड़कियों के पास आकर न मुस्कुराया करो।

अगर जाना ही है तो ख़ामोशी से चले जाना,
हर बार लौटकर हमें न आज़माया करो।

ये दिल अभी पूरी तरह पत्थर हुआ नहीं,
इसे हर बार अपना कहकर न तड़पाया करो।

जो बुझ चुका है उसे राख ही रहने दो अब,
हर हवा में चिंगारी न फिर से फूँका करो।
-रतन कुमार कैथवास
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

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