मेरे ही नाम से, महफ़िल में रौनक़ सजता है,
मेरी ही आग से, अपना चिराग़ जलाता है।
अजब है, दुश्मनी का ये सलीक़ा उसका,
मुझे मिटाने की सोचता है, मुझे ही गाता है।
झूठ के नर्क में, मत डाल मुझे ऐ हमदम,
सच की राहों में, मेरा ऐतबार रहने दे।
लोग कहते हैं कि, मैं युधिष्ठिर हूँ,
तो कहने दे, मेरे किरदार में सच का ख़ुमार रहने दे।
मेरी ख़ामोशी को, कमज़ोरी समझने वालो,
मेरे लहजे में भी, तूफ़ान पलते रहते हैं।
हम वो शख़्स हैं, जो सच के लिए जीते हैं,
लाख इल्ज़ाम हों, उसूल नहीं बदलते हैं।
दुश्मनी लाख सही, दिल में अदब बाक़ी है,
मेरे अल्फ़ाज़ में, इंसानियत ज़िंदा है अभी।
वो मेरे शे’र चुराकर, मेरी पहचान मिटाए,
मेरी आवाज़ की गूँज, तो बाक़ी है अभी।
मैंने सच बोलकर, हर बार नुकसान पाया,
फिर भी झूठ के दरबार में, सजदा न किया।
लोग किरदार के, सिक्के उछालते रहे,
मैंने ज़मीर का सौदा, कभी भी न किया।
-रतन कुमार कैथवास
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