मेरी आँखों से मत छीनो मेरे गुलाबी ख़्वाब,
इन्हीं के दम पे खुलती हैं सुबह मेरी आँख।
मैं तिल-तिल जी रहा हूँ उसकी दुआओं के सहारे,
मेरी साँसों में अभी बाक़ी हैं उम्मीदों के गुलाब।
तुम अपनी बेरुख़ी से मेरे दिल को मत दुखाना,
बड़ी मुश्किल से सँवारे हैं उलफ़त के ये ख़्वाब।
मेरी आँखों में अभी कुछ चाँदनी बाक़ी है,
मेरे होंठों पे अधूरी इक हँसी बाक़ी है।
ज़िंदगी ने छीन लीं मुझसे कई रंगीनियाँ,
मेरे दिल में मगर तेरी आरज़ू अभी बाक़ी है।
तुम निगाहों से मेरी दुनिया उजाड़ो न रहबर,
मेरी साँसों में अभी थोड़ी भाप बाक़ी है।
मैंने हर ज़ख़्म को मुस्कराकर छुपाया है यहाँ,
अपने अश्कों को भी पलकों में रोक रखा है यहाँ।
तुम नज़र फेर के मेरा हौसला मत तोड़ना,
बड़ी मुश्किल से ख़ुद को मैंने भुलाया है यहाँ।
मेरे ख़्वाबों की हिफ़ाज़त की दुआ करना अभी,
मैंने टूटे हुए दिल को फिर जोड़कर बनाया है यहाँ।
तेरी आँखों की अगर थोड़ी-सी नर्मी मिल जाए,
मेरी वीरान-सी दुनिया को भी रौनकें मिल जाए।
मैं कोई ताज नहीं माँगता तेरी हुकूमत से,
बस निगाहों में तेरी थोड़ी-सी तसल्ली मिल जाए।
तुम मुझे अपनी नज़र में कभी कमतर न समझना,
क्या पता तेरी इनायत से मुझे ज़िंदगी मिल जाए।
मेरे गुलाबी ख़्वाबों को, सलामत रहने दो,
मेरे दिल में उलफ़त की, हुकूमत रहने दो।
मैं बहुत देर से, इसी उम्मीद के सहारे ज़िंदा हूँ,
मेरी आँखों में ज़रा, ख़्वाबों की दौलत रहने दो।
तुम आहत न करो, अपनी निगाहों से मुझे,
मेरे हिस्से में अभी, थोड़ी-सी राहत रहने दो।
-रतन कुमार कैथवास
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