मेरे बाग़ के बेर तुम्हें इतने पसंद आते हैं,
मँगवाकर खाती हो, फिर भी नख़रे दिखाती हो।
कभी मीठी-सी बातें, कभी शिकवों की झड़ी,
तुम प्यार भी करती हो, और लड़ाई भी करती हो, ऐसा क्यों।
बेरों की टोकरी लिए मैं तुम्हारा इंतज़ार करता रहा,
तुम आओगी इसी आस में दिल को बेकरार करता रहा।
सोचा था आज बैठेंगे, कुछ प्यार की बातें होंगी,
मगर देर हुई तो ग़ुस्सा तुम्हारा इज़हार करता रहा, ऐसा क्यों।
तुम कहती हो कि देर से आने की आदत छोड़ दो,
मेरी छोटी-छोटी ख़ुशियों से मुँह न तुम मोड़ लो।
मैंने कहा, बेर तोड़ने में कुछ वक़्त लग गया,
तुम बोलीं, बहाने छोड़ो, अब ये नाता जोड़ लो, ऐसा क्यों।
मैं भी क्या करूँ, तुम्हारी हर अदा निराली है,
ग़ुस्से में भी लगती हो जैसे सुबह की लाली है।
बेर मीठे हों तो चेहरे पर मुस्कान आ जाती है,
और खट्टे पड़ जाएँ तो तुमने बहस छेड़ डाली है, ऐसा क्यों।
चलो, अब रूठना छोड़ो, ये बेर तुम्हारे नाम हैं,
मेरे बाग़ की हर डाली पर, तुम्हारे ही पैग़ाम हैं।
तुम देर से आने पर भी, मुझसे लड़ती रहना,
तुम्हारे इन नख़रों में ही, मेरे प्यार के मुक़ाम हैं।
-रतन कुमार कैथवास
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