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मासूम शरारत हो

                
                                                         
                            तुम धूप हो या कोई मौसम की शरारत हो,
                                                                 
                            
क्यों गर्मी-सी भर आई ठंडी-सी हवाओं में?

तुम चाँद हो या रात की कोई नज़ाकत हो,
क्यों चाँदनी उतर आई मेरी खामोशी में?

तुम ख़ुशबू हो या गुलदस्ते की कोई आहट हो,
क्यों रंग भर गए हैं सूनी-सी फ़िज़ाओं में?

तुम आग हो या उलफ़त की कोई इनायत हो,
क्यों शोले-से उठने लगे हैं मेरी सदाओं में?

तुम बारिश हो या बादल की कोई चाहत हो,
क्यों प्यास जग गई है भीगी-सी घटाओं में?

तुम ख़्वाब हो या नींद की कोई हिमाक़त हो,
क्यों जागने लगा हूँ मैं सारी सारी रातों में?

तुम रौशनी हो या सुबह की कोई करवट हो,
क्यों उजाला भर गया है मेरी अँधेरी राहों में?

तुम रश्क़ हो या दिल की कोई मासूम शरारत हो,
क्यों तुम ही तुम नज़र आते हो अब मेरी निगाहों में?
-रतन कुमार कैथवास
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एक घंटा पहले

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