जो अधूरा था मन में, समर्पण हुआ,
जो घिसता रहा, वो चंदन हुआ।
घाव जब प्रार्थना की तरह बोलने लगे,
हर कराहट में कोई वचन हो गया।
टूटकर भी जिसे मन ने छोड़ा नहीं,
वही विश्वास बनकर शरण हो गया।
जो बिखरता रहा वक़्त की आँधियों में,
वही अंततः मेरे मन का दर्पण हुआ।
जिसे दर्द समझकर छुपाता रहा मैं,
वही मेरी रूह का स्पंदन हुआ।
जो अँधेरा था आँखों के भीतर कभी,
तेरे आने से दीपक-सा रोशन हुआ।
मैं मिटाता रहा अपनी हस्ती मगर,
मेरा मिटना ही मेरा सृजन हुआ।
जिसे हार समझकर झुका था कभी,
वही झुकना मेरा अभिनंदन हुआ।
मैंने माँगा नहीं कुछ भी दुनिया से फिर,
जो मिला तेरी याद में, वो धन्य हुआ।
जिसे उम्र भर ढूँढ़ता ही रहा,
वही मेरे भीतर का जीवन-दर्शन हुआ।
-रतन कुमार कैथवास
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