ऐसे क्यों घूरती रहती हो, कोई राज़ तो बताना होगा,
लगता है तुम्हारी आँखों का लिटमस टेस्ट करवाना होगा।
नज़रें मिलते ही रंग बदलती हो, ये कैसा इशारा है,
कहीं आँखों में छुपा कोई इश्क़ का नज़ारा है।
इतनी देर तक यूँ देखोगी तो दिल को समझाना पड़ेगा,
तुम्हारी इन निगाहों का भी कोई इलाज़ कराना पड़ेगा।
कभी लाल, कभी नीली, कभी शोख़ी का रंग चढ़ता है,
तुम्हारी आँखों का मौसम हर पल नया-नया लगता है।
ये कैसी निगाहें हैं, जो सवाल भी करती हैं, जवाब भी,
लगता है इन आँखों ने सीख लिया है रश्क़ का हिसाब भी।
घूरना है तो थोड़ा प्यार से घूरो, यूँ इल्ज़ाम न लगाओ,
वरना इन आँखों की रिपोर्ट लेकर मेरे दिल को न फँसाओ।
-रतन कुमार कैथवास
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