जहाँ दीवारें हैं, वहाँ थोड़ी और सीमेंट भर दे,
जहाँ ख़ामोशियाँ हैं, वहाँ कोई ताजी हँसी भर दे।
मेरे आँगन में उतर आए सुकूँ की धूप,
हर एक कोना तेरी यादों से सुवासित कर दे।
जो रूठे हैं, उन्हें फिर से क़रीब ला ईश्वर,
बिछड़े अपनों को फिर से मुकद्दस कर दे।
मेरी चौखट पे कोई लौट के गर आए ऐसा,
इस वीरान से दर को तू संगीत का मृदंग कर दे।
बहुत थक चुका हूँ दुनिया की भीड़ में चलते-चलते,
मेरे सीने को भी थोड़ा सा समंदर कर दे।
और कुछ भी नहीं माँगता मैं तुझसे 'रतन',
जिसे घर कह सकूँ, ऐसा मेरा घर कर दे।
-रतन कुमार कैथवास
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