पारे की तरह तेरी नज़र ऊपर-नीचे क्यों होती है,
ज़रा ठहरकर देखो, कोई हादसा ना हो जाए।
ये आँखें हैं या मौसम की कोई तेज़ रवानी,
एक पल में दिल डूबे, दूजे पल तैरता जाए।
यूँ चोरी-चोरी नज़रें मिलाकर न देखा करो,
कहीं धड़कनों का सिलसिला बेकाबू न हो जाए।
तेरी आँखों की तपिश कुछ कम तो नहीं लगती,
तू देर तक देखे तो ये दिल ही पिघल जाए।
नज़रें संभालकर रखना, ये खेल नहीं उलफ़त,
कहीं देखते-देखते कोई रश्क़ न हो जाए।
-रतन कुमार कैथवास
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