आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

ख्वाबों में मिलें

                
                                                         
                            वक़्त की धूल ने चेहरों को धुँधला कर दिया,
                                                                 
                            
फिर भी कुछ रंग पुराने से जवाबों में मिलें।

तेरी यादों को समेटे हुए बैठा हूँ अभी,
कौन जाने तेरे ख़त आज भी गुलाबों में मिलें।

हमने जिस मोड़ पे छोड़ा था हसरत का सफ़र,
हो सकता है वही रास्ते हिसाबों में मिलें।

तू अगर याद करे स्याह रात के सन्नाटे में,
हम भी शायद किसी टूटे हुए ख़्वाबों में मिलें।

ज़िंदगी ने हमें बिखरा दिया, मौसम की तरह,
फिर भी कुछ हिस्से हमारे, तेरे ख़्वाबों में मिलें।

और जब उम्र की आख़िरी शाम उतरने लगे,
हम तुझे ढूँढते हुए अपने जवाबों में मिलें।
रतन कुमार कैथवास
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
44 minutes ago

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर