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खामोशी समझ ली होगी कहीं

                
                                                         
                            बादल निभाते हैं अपनी तड़प, बरसात होने लगी,
                                                                 
                            
किसी ने पढ़ लिया उसका दर्द, तो आँखें भीगने लगीं।

बादल के सीने में भी कोई तूफ़ान पलता है,
बिजली बनकर कभी-कभी उसका दर्द निकलता है।

वो चुप रहा, तो बादल उसके राज़ कहने लगे,
जो आँसू आँखों में थे, वो सावन बनकर बहने लगे।

किसी ने छू लिया शायद, उसकी ख़ामोशी का किनारा,
वरना यूँ ही नहीं रोता ये आसमान बेचारा।

उसकी तन्हाई का असर बादलों पर भी होने लगा,
सूखा हुआ आसमान अचानक दरिया होने लगा।

जिस दर्द को उसने दुनिया से छुपाकर रखा था,
बादल ने बरसकर, उसका हर राज़ कह दिया था।

हवाओं ने पूछा तो बादल कुछ बोल न पाए,
आँसू बरसते रहे, मगर ग़म खोल न पाए।

शायद किसी ने उसकी आँखों में दर्द पढ़ लिया,
तभी तो मौसम ने भी, अपना मिज़ाज बदल लिया।

वो दर्द उसका था, मगर मौसम रोने लगा,
एक ज़ख़्म दिल में था, पूरा शहर भीगने लगा।

अब पूछते हो, क्यों बरसता है बादल रात-दिन,
किसी ने… उसकी ख़ामोशी समझ ली होगी कहीं।
-रतन कुमार कैथवास
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
43 मिनट पहले

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