जब आम बहुत बौराए थे, भौंरों ने कुछ गीत सुनाए,
महकी-महकी बगिया में फिर, मौसम ने संदेश सुनाए।
डाली-डाली झूम उठी थी, पत्तों ने सुर ताल मिलाए,
धरती ने चादर ओढ़ी थी, अम्बर ने सपने बरसाए।
कोयल ने जब तान छेड़ी, पुरवाई भी मस्त हुई,
कलियों के अधरों पर देखो, हँसने की शुरुआत हुई।
मधुमक्खी ने रस की ख़ातिर, कितने फेरे लगाए,
प्रेम-पगी उस ऋतु ने जाने, कितने रंग सजाए।
कच्ची अमिया की ख़ुशबू ने, बचपन के दिन याद दिलाए,
गाँव की गलियों में फिर से, बीते क़िस्से लौट के आए।
पेड़ों के नीचे बैठकर, कितने सपने हमने सजाए,
धूप सुनहरी छाँव से मिलकर, जीवन के अर्थ समझाए।
बौर अगर उम्मीद है मन की, फल मेहनत का नाम है,
ऋतुओं का यह खेल निराला, हर बदलाव पैग़ाम है।
जो पतझड़ में धीरज रखता, उसके दिन भी मुस्काए,
वक़्त बदलता है तो सूनी डाली पर फूल खिलाए।
जब आम बहुत बौराए थे, मन में अरमान जगाए,
भौंरों ने कुछ गीत सुनाए, कोयल ने सुर बरसाए।
कुदरत की इस प्रेम-कथा को, शब्दों में कैसे गाएँ,
जब बगिया में प्रेम खिले तो, पत्थर दिल भी हर्षाएँ।
-रतन कुमार कैथवास
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