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हम मिलकर अपनी जिंदगी को, फिर से गुलाब करेंगे

                
                                                         
                            शिकायतें क्या हैं, मेरी नज़रों से मुख़ातिब तो हो जाइए,
                                                                 
                            
दिल में जो भी सवाल हैं, खुलकर हमें बताइए।
यूँ दूरियों को देखकर फ़ैसले न कीजिए जनाब,
मेरी ख़ामोशी का मतलब पहले समझ तो जाइए।

मैं घर से दूर निकला था, तुम्हारा घर सजाने को,
रोज़गार की तलाश में, अपना कल बनाने को।
ये शौक़ नहीं था मेरा, तुमसे दूर जा बसना,
मैं निकला था ज़िंदगी के हर अँधेरे को मिटाने को।

मेरी मेहनत को गुनाहों की तरह मत तौलिये,
मेरी मजबूरियों को बेवफ़ाई के तराज़ू में मत तोलिये।
जो वक़्त मैंने परदेस में तन्हा गुज़ारा है,
उसकी तपिश को भी कभी अपने दिल से टटोलिये।

तुम्हारी ख़ुशियों की ख़ातिर ही सफ़र पर निकल गया,
अपनी हँसी छोड़कर मैं ज़िम्मेदारियों में ढल गया।
तुमने समझा कि मैं बदलकर दूर हो गया तुमसे,
मैं तुम्हारा कल सँवारते-सँवारते ख़ुद ही बदल गया।

आओ, बैठो सामने, फिर दिल का हिसाब करेंगे,
जो शिकवे हैं तुम्हारे, उनका भी जवाब करेंगे।
इल्ज़ाम लगाने से न मोहब्बत बचेगी, न रिश्ते,
हम मिलकर अपनी ज़िंदगी को, फिर से गुलाब करेंगे।
-रतन कुमार कैथवास
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
15 घंटे पहले

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