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धूप भी हँसकर सहते हैं

                
                                                         
                            किसे हासिल है दुनिया के मुक़द्दस इम्तिहानों का पता,
                                                                 
                            
हमें तो बच के निकलना भी नहीं आता।

जहाँ सब लोग मौसम देखकर रुख़ बदल लेते हैं,
हमें तूफ़ान से डरकर सँभलना भी नहीं आता।

जो आग सामने हो, उसमें उतर जाते हैं अक्सर,
हमें राख देखकर पीछे हटना भी नहीं आता।

किसी के दर्द को देखें तो अपना समझ लेते हैं,
हमें गैरों के ज़ख़्मों से निकलना भी नहीं आता।

हम अपने हिस्से की धूप भी हँसकर सहते हैं,
हमें साए की तलाश में भटकना भी नहीं आता।

मुक़द्दर चाहे जितने इम्तिहाँ लेता रहे हमसे,
हमें हार के आगे फिर झुकना भी नहीं आता।

'रतन' रास्ते कठिन हों तो होने दो,
हमें मंज़िल से पहले कहीं रुकना भी नहीं आता।
-रतन कुमार कैथवास
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एक घंटा पहले

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