एक विषधर चंदन से बोला,
“आ जाऊँ क्या तेरी छाया में?
मन में बहुत गरल भरा है,
थक गया हूँ विष फैलाने में।
तेरी शीतलता की चर्चा सुनी है,
तेरी शीतल ख़ुशबू का संसार गवाह,
क्या कुछ पल तेरे पास बिताने से,
मिल सकती है मन को कोई राह?”
चंदन बोला, “आने पर तेरे,
मैंने कभी सवाल नहीं किया,
तूने मुझसे लिपटकर देखा,
मैंने तुझसे मलाल नहीं किया।
मेरा स्वभाव सुगंध लुटाना,
तेरा स्वभाव विष उगलना है,
पर सोच ज़रा, ऐ नाग मेरे,
क्या तुझे इसी स्वभाव में जलना है?”
विषधर बोला, “तेरी शीतलता,
मेरे भीतर क्यों नहीं उतरती?
तेरी छाया में बैठने पर भी,
मेरी विष की प्रकृति नहीं बदलती।
क्या तप करने से, ध्यान लगाने से,
मन का सारा गरल मिट सकता है?
क्या भीतर बैठा क्रोध और ईर्ष्या,
सच्चे चिंतन से घट सकता है?”
चंदन बोला, “सुन रे विषधर,
छाया केवल राह दिखाती है,
मन की गाँठें खोलने की
मेहनत स्वयं करनी पड़ती है।
ध्यान अगर बस आँखें मूँदना,
तप अगर केवल कष्ट उठाना,
तो भीतर का विष नहीं घटता,
सीखना होगा स्वयं को समझाना।”
“मनुष्य भी जब क्रोध में जलता,
अपशब्दों के तीर चलाता है,
अपने अहंकार की ख़ातिर,
अपनों को ही चोट पहुँचाता है।
यदि वह ठहरकर ख़ुद को देखे,
अपने दोषों को पहचाने,
करुणा, धीरज, सत्य के पथ पर,
अपने आचरण को ढालने लगे।”
तब विषधर ने शीश झुकाया,
बात हृदय के पार उतर गई,
चंदन की शीतल छाया में,
एक नई-सी सोच उभर गई।
समझ गया वह बात पुरानी,
केवल संग से कौन सुधरता है?
चंदन पास रहे तो सुगंध मिले,
पर मन का विष स्वयं ही उतरता है।
तो इस पर ज्यादा मेहनत कर तू…
-रतन कुमार कैथवास
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