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चालीस पौंड का नमक भी, कम पड़ सकता है

                
                                                         
                            किसी के साथ दो पल चलकर, उसे अपना न मान लेना,
                                                                 
                            
हर मीठी बात पर, उसके किरदार को भी ठीक से पहचान लेना।
वफ़ा की असलियत तो, मुश्किलों में सामने आती है,
सुख के मेले में, हर शख़्स को हमसफ़र न मान लेना।

चालीस पौंड नमक भी, कम पड़ सकता है जनाब,
इंसान की फ़ितरत का, बड़ा गहरा है हिसाब।
कोई वक़्त के साथ अपना, कोई वक़्त पर बेगाना,
चेहरे पढ़ना आसान है, मुश्किल है दिल को जान पाना।

कभी भूख में, कभी प्यास में, कभी इम्तिहान में देखो,
कौन साथ खड़ा रहता है, उसे तूफ़ान में देखो।
जो हँसी में साथ हों, उन्हें अपना कहना आसान है,
जो दर्द बाँटने आ जाएँ, उन्हें पहचान में देखो।

न दौलत से, न शोहरत से, न बातों के हुनर से,
इंसान पहचाना जाता है, उसके मुश्किल सफ़र से।
जो वक़्त बदलते ही, अपना रंग बदलने लगे,
उसकी असलियत, खुलती है ज़रा-से सब्र से।

रिश्तों की किताबों में, तजुर्बे ही सबक़ देते हैं,
कुछ सपने भी ज़ख़्म देकर, जीने का ढंग देते हैं।
चालीस पौंड नमक खाने की कहावत, यूँ ही नहीं बनी,
इंसान को समझने में, कभी-कभी उम्र के कई साल लगते हैं।
-रतन कुमार कैथवास
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