रिश्तों को जोड़ने के लिए, थोड़ा नरम होना पड़ता है,
अपनी ज़िद की दीवारों से, नीचे उतरना पड़ता है।
हर बात पर अकड़ दिखाने से, घर नहीं बनते जनाब,
कभी-कभी अपनों की ख़ातिर, ख़ुद को बदलना पड़ता है।
सीमेंट नरम हो तो ईंटों को, जोड़ने का काम करे,
मिलकर रहने वालों के दिल में, प्रेम का पैग़ाम भरे।
लेकिन हर मौसम की बारिश में, रिश्ता बहने लगे अगर,
तो उसकी बुनियाद को मज़बूत, रखना भी ज़रूरी है।
जहाँ ज़रूरत हो झुकने की, वहाँ अकड़ अच्छी नहीं,
जहाँ उसूलों की बात उठे, वहाँ लचक अच्छी नहीं।
नरमी से दिल जीतना, कोई कमज़ोरी नहीं होती,
हर ग़लत बात पर चुप रहना, भी समझदारी नहीं होती।
जोड़ने में प्यार चाहिए, जोड़े रखने को विश्वास,
रिश्तों की दीवारों में, दोनों का हो मधुर निवास।
सिर्फ़ मोहब्बत से क्या होगा, गर मर्यादा टूट गई,
सीमेंट सख़्त न हो तो आख़िर, ईंटों की पकड़ छूट गई।
वक़्त के साथ समझो यारो, जीवन का यह सार,
कहाँ झुकना है प्रेम के ख़ातिर, कहाँ रहना मज़बूत दीवार।
नरमी से रिश्ते जोड़ो, कठोरता से उन्हें सँभालो,
सीमेंट-सा किरदार रखो…
पहले नरमी से जोड़ो, फिर कठोरता से मजबूत रहो।
-रतन कुमार कैथवास
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