ये कैसे जज़्बात हैं सावन के, ये बादल थमते नहीं,
उमड़ते हैं, घुमड़ते हैं, मगर दिल से कुछ कहते नहीं।
तेरी ख़ामोशी में भी जैसे कोई बरसाती पैग़ाम है,
बूंदें गिरती रहती हैं, मगर लबों पर तेरा नाम नहीं है।
कभी बिजली-सी चमक उठती है तेरी यादों के पार,
कभी बादल बन घिर आता है दिल में वही इंतज़ार।
ये कैसी प्यास है जिसे कोई बारिश बुझा न सकी,
सारी रात बरसते रहे, फिर भी प्यास मिटा न सकी।
तेरे अनकहे आग़ाज़ ने कैसी हलचल मचा दी है,
सोई हुई धड़कनों में फिर से कोई सदा जगा दी है।
बादलों की तरह तेरी बातें भी दूर तक जाती हैं,
बरसती नहीं आँखों से, मगर भीतर तक भिगो जाती हैं।
कहाँ से लाऊँ वो सुकून जो तेरी ख़ामोशी दे जाए,
कोई बादल ठहरकर तेरे दिल का राज़ कह जाए।
सावन भी तेरे बिना जैसे अधूरा-सा लगता है,
हर बरसता कतरा तेरी कमी का किस्सा कहता है।
उमड़ते हैं बादल, घुमड़ती है दिल की बेचैनी,
तेरी आहट की चाहत में कटती नहीं ये रैना।
शायद किसी सुबह ये बरसात भी थम जाएगी,
तेरी अनकही बात मेरे दिल तक पहुँच जाएगी।
-रतन कुमार कैथवास
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