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बरसात सिर्फ पानी नहीं, अश्कों की रवानी है

                
                                                         
                            तमाशा बिजलियों का ख़त्म हो, तो बरसात बरसे,
                                                                 
                            
कितनी तकलीफ़ में हैं, ये कड़कती हुई बिजलियाँ,
ज़रा बादलों के मन में, उतरकर तो देखो,
कितना दर्द छुपाए हैं, ये गरजती हुई बिजलियाँ।

जो आसमान में चमकें, उन्हें शोहरत मिली है,
जो धरती पर गिरें, उनकी कहानी कौन लिखे,
हर चमक के पीछे, कोई तड़पता हुआ दिल है,
हर गर्जना के पीछे, कोई ख़ामोशी कौन पढ़े।

ये बादल भी, न जाने किस क़दर मजबूर होंगे,
जो आँसू पी रहे हैं, वही भीतर से चूर होंगे,
बरसने की इजाज़त भी, जिन्हें मिलती नहीं है,
वही बिजली बनकर, हर पल मशहूर होंगे।

कभी फ़ुर्सत मिले तो, इनकी बेचैनी भी समझना,
सिर्फ़ चमक देखकर, इनकी कहानी मत लिखना,
जो टूटकर बिखरती हैं, किसी वीरान धरती पर,
उनकी पीड़ा को भी, अपनी ज़ुबानी मत लिखना।

तमाशा ख़त्म हो जाए, तो सन्नाटा भी बोलेगा,
हर कड़कती हुई, बिजली का दर्द बाहर निकलेगा,
बरसात सिर्फ़ पानी नहीं, अश्कों की रवानी है,
हर चमक के पीछे, छुपी एक अधूरी कहानी है।
-रतन कुमार कैथवास
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
12 घंटे पहले

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