अपनी आँखों का पानी कभी मरने मत देना,
ज़मीर को हालात के हाथों झुकने मत देना।
सवाल उठेंगे तो जवाब भी देने होंगे,
सच के सफ़र में क़दम पीछे हटने मत देना।
चाहे ज़माना तुम्हें लाख आज़माए,
अपने भीतर की पाकीज़गी मिटने मत देना।
हर मोड़ पर ज़िंदगी इम्तिहान लेगी,
हर ख़ामोशी तुमसे कोई बयान लेगी।
कितने सवाल उठेंगे तुम्हारी सच्चाई पर,
हर नज़र तुम्हारे किरदार का हिसाब लेगी।
तुम अपने उसूलों की हिफ़ाज़त करना,
वक़्त हर शख़्स से उसकी पहचान लेगी।
किसी की पाकीज़गी से रश्क मत करना,
किसी के साफ़ दामन पर शक मत करना।
हर शख़्स की अपनी लड़ाई है ज़िंदगी में,
बिना जाने किसी पर इल्ज़ाम मत धरना।
जो दूसरों के दर्द को महसूस कर सके,
उस इंसानियत को कभी कम मत करना।
ज़िंदा रहना है तो, एहसास बचाकर रखना,
अपने लहजे में, थोड़ा लिहाज़ बचाकर रखना।
जमीर से बड़ी, कोई दौलत नहीं है जमाने में,
अपने भीतर की आवाज़, बचाकर रखना।
भीड़ चाहे, जिस तरफ़ भी चलती रहे,
सच के लिए अपने, परवाज़ बचाकर रखना।
सवाल होंगे तो हम जवाब भी देंगे,
अँधेरों में अपने ख़्वाब की खबर भी देंगे।
नहीं बेचेंगे ज़मीर को दुनिया के बाज़ार में,
ज़रूरत पड़ी तो अपना हिसाब भी देंगे।
आँखों का पानी ही इंसानियत की निशानी है,
हम ख़ुद टूट जाएँगे, मगर अपनी पाकीज़गी को ज़िंदा रखेंगे।
-रतन कुमार कैथवास
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