दुनिया हमें गुनाहों का हिसाब देती रही,
हमने कहा कि दिल में अभी बंदगी बहुत है।
चेहरे पे मत तलाश करो पाकीज़गी का रंग,
भीतर जो साफ़ बचा है, वही ज़िंदगी बहुत है।
हमसे न पूछिए कि कहाँ-कहाँ से गुज़रे हैं,
हर ज़ख़्म कह रहा है कि आपकी कमी बहुत है।
इल्ज़ाम जितने चाहो हमारे नाम लिख दो,
हमको तो अपने रब से यही बन्दगी बहुत है।
हमने भी देखे हैं कई चेहरे नेकियों के,
कपड़ों में पाक-साफ लोग, मगर दिल में कमी बहुत है।
फ़ैसला करने वालों, ज़रा दिल भी देख लेना,
इंसान की ख़ता से बड़ी उसकी तौबा बहुत है।
-रतन कुमार कैथवास
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