रात आँखों में ठहरती ही चली जाती है,
किससे कहें दिल का ये सारा मलाल।
कभी धड़कता था सीने में किसी के लिए,
अब तो ख़ामोश है हर एक सवाल।
वक़्त ने ऐसे तराशा है इस शख़्स को,
दर्द भी अब इसे लगता है महज़ एक मिसाल।
नींद आए भी तो किस ख़्वाब की उम्मीद करें,
हर तरफ़ जागता रहता है कोई बवाल,
अब जो पत्थर है, आदमी था कभी,
उसके भीतर भी था एक नर्म-सा दिल हाल-बेहाल।
-रतन कुमार कैथवास
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