हर बात को तलाश न कर लफ़्ज़ों की भीड़ में,
जो आँख कह रही है, वही इक़रार कर ले।
चेहरे की ख़ामोशी में कई राज़ मिलेंगे,
तू अपनी हर किताब का इज़हार फेंक दे।
वो शख़्स झूठ बोल भी दे गर ज़ुबाँ से कभी,
आँखों में देख लेना, फिर इनकार फेंक दे।
काग़ज़ पे जो लिखा है वो आधा ही सच होगा,
चेहरे को पढ़ सके तो हर अख़बार फेंक दे।
-रतन कुमार कैथवास
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