गर्दिशें ज़ारी हैं हर ठौर
करेगा प्यारे कब तू गौर |
नायकों को नेपथ्य ढकेल
हो गये खलनायक सिरमौर ||
न दीखेगा पेड़ों पर बौर
अभी अच्छे दिन आने और |
तुझे रहना है ख़ाली ज़ेब
छिनेगा हाथों से भी कौर ||
नया जो दीख रहा है दौर
न इसके भीतर कुछ भी सौर |
चला तू सड़े-गले से काम
बंटेगा राशन सिर्फ भिजौर ||
-रमेशराज
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