आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मुक्तक विन्यास में तेवरी

                
                                                         
                            बांहों के हार शांतरस में
                                                                 
                            
आया शृंगार शांतरस में |
पकवान समझकर नारी को
टपके है लार शांतरस में |
रस का व्यापार शांतरस में
धन का भण्डार शांतरस में |
इत श्याम-श्याम राधे-राधे
उत चीख-पुकार शांतरस में |
नित क्रोध अपार शांतरस में
मारक हथियार शांतरस में |
कैसा है ये वैराग्य अजब
सत्ता-विस्तार शांतरस में |
-रमेशराज
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर