डूब कर जिसमें नई राह नज़र आई है।
कुछ नहीं है ये तेरे प्यार की गहराई है।
वो भी मुझको न समझ पाया जो ये कहता था,
तू कोई ग़ैर नहीं है मेरी परछाई है।
जिससे गलती किसी को अपनी नज़र आ जाए,
ऐसी ऐनक अभी दुनिया में कहाँ आई है।
मैं अगर सच में गलत हूँ तो यकीं रख रब पर,
उसके इंसाफ से क्या शय कोई बच पाई है।
"अल्प" उभरे थे बड़ी मुश्किलों से हम जिससे,
वक़्त ने फ़िर से वही दास्तां दोहराई है।
© राखी "अल्प"
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