हर किसी के हाथ में एक अधूरी पांडुलिपि है,
जिसके कुछ पन्ने धूप में चमके,
कुछ बारिश की सिलन में धुंधले पड़ गए।
चौराहे पर टकराते हुए अनगिनत चेहरे,
सिर्फ़ नाम और पते नहीं हैं—
वे चलते-फिरते किस्से हैं,
जिन्हें किसी ने पूरी तरह सुना ही नहीं।
किसी के हिस्से का आसमान
दस बाई बारह के कमरे की बालकनी तक सिमटा है,
तो कोई समंदर नाप कर भी
अपने अंदर का खालीपन नहीं भर पाया।
एक चाय की प्याली के किनारे
सुलगती हैं किसी के संघर्ष की सुबहें,
तो किसी की बेशकीमती कार की पिछली सीट पर
खामोशी से टूटते हैं नींद के समझौते।
यहाँ कोई खलनायक नहीं मुकम्मल,
कोई नायक भी बेदाग़ नहीं दिखता,
सब अपनी-अपनी उलझनों के हाशिये पर
ज़िंदगी का मतलब तलाशते किरदार हैं।
हम जो बाहर से देखते हैं,
वह बस आवरण है, रंग-बिरंगी जिल्द है;
भीतर हर शख्स एक ऐसी लड़ाई लड़ रहा है
जिसका कोई गवाह नहीं, कोई पदक नहीं।
अपनी-अपनी कहानी के पन्नों को समेटे
सब बढ़ रहे हैं अपने-अपने मोड़ की तरफ—
हर किसी के हाथ में एक अधूरी पांडुलिपि है,
जिसके कुछ पन्ने धूप में चमके,
कुछ बारिश की सिलन में धुंधले पड़ गए।
-राकेश रंजन
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