*केवल हरी भरी खदान नहीं*
आम का मेरे घर वाला पेड़
आम तो आते हैं हर बार,
आम तो आते हैं हर बार।
पर आम वो कि आम नहीं,
कुछ खास है, केवल नाम नहीं!
आम तो आते हैं हर बार,
साल में एक बार, दो बार नहीं,
बारम्बार सदाबहार, केवल दो-चार-पाँच नहीं,
कुछ खास है, केवल नाम नहीं!
आम तो आते हैं हर बार।
कभी लगाया था, अनजाने में नहीं,
शीतल छाँव की बौछार—
केवल 'आम के आम गुठलियों के दाम' नहीं,
कुछ खास है, केवल नाम नहीं!
आम तो आते हैं हर बार।
मेरी पूजा की मूल हैं वो, केवल पात नहीं,
जनाब! आम हैं वो, केवल मेरी जान नहीं,
कुछ खास है, केवल नाम नहीं!
आम तो आते हैं हर बार।
हवन की शुद्ध सामग्री,
केवल हरी भरी खदान नहीं।
छोटे से बड़ा होते हृदय का टुकड़ा,
केवल किसानी की शान नहीं,
कुछ खास है, केवल नाम नहीं!
पर आम वो कि आम नहीं,
कुछ खास है, केवल नाम नहीं!
-राकेश रंजन
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