लिख कर क्या बताऊँ, मैं क्या लिखूँ
कलम उठाऊँ तो हाथ रोकती है
शब्द बनाता हूँ तो मन रोकता है
तुम्हें याद करूँ यादें रोकती है
अब तो उम्र भी पिघल रही है
आंखे बंद करूँ तो ज़िंदगी हँसती है
वाकिव था मैं उस कसमों से
जब तुम अपने सिर पर हाथ रखती थी
और कसमें मेरी होती थी
फिर भी एक रिश्ते को मैंने उम्र से बांध कर रखा है
पर कैसे बताऊँ तुझे
मेरी उम्र के उम्र का पता नही है मुझे.
पर यह मालूम है की...... रिश्ते पाक है अभी ......
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