हटाओ जाले ये भ्रम के, उजालों को अंदर आने दो
छोड़ दो दामन अंधेरों के, उन्हें वापस भी जाने दो
ठिठक गयी हैं खुशियां, घर की दहलीज पर मेरी
विदा कर के अंधेरों को, उन्हें अंदर बुलाने दो
घर में कोई किसी से बरसों से नहीं मिला है
बस आभास भर सा है किसी के साथ रहने का
ढूँढ़ लाओ सभी को आज, कि कोई छूट ना पाये
मुस्कुराहटों की महफिलें फिर से लुटाने दो
अक्स हर ओर अपना ही, क्यूँ दिखता है अब इस घर में
कहाँ हैं वो मेरे अपने, उन्हें अब ढूंढ लाने दो
घेरे तुम्हे अपने, मिलेंगे सब साथ ही तुमको
महज इस भ्रम के दर्पन को, पहले टूट जाने दो
परदे गलतफहमी के, हैं चारों ओर ही लटके
गिरा दो सारे पर्दों को, छुपी है घर की सब रंगत
फिर से उन अलापों की ना कोई रागिनी छेड़ो
कि जुट जाओ सारे अब, घर को घर बनाने दो
-डॉ राजबाला यादव
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