उसकी ख़ुशी की ख़ातिर क्या-क्या नहीं किया,
ख़ुद को मिटा दिया मगर शिकवा नहीं किया।
कुछ भी किया हमने मगर रुस्वा नहीं किया,
उसके सिवा किसी को देखा नहीं किया।
हाँ ठीक है, जो सोचा था वो हासिल नहीं हुआ,
क़िस्मत से फिर भी हमने झगड़ा नहीं किया।
चाहते तो छीन लाते तुम्हें हाथ-ए-क़िस्मत से,
ये और बात है कि हमने ऐसा नहीं किया।
लकीरों के फ़रेब में उलझा नहीं कभी,
तेरे सिवा किसी की चर्चा नहीं किया।
तू ख़ुश है गर कहीं तो बस इतना बहुत है,
तेरी ख़ुशी में हमने पहरा नहीं किया।
हम टूटे, हम बिखरे, मगर झुके नहीं,
तेरे दर पे ख़ुद को सस्ता नहीं किया।
-अर्णव ...
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