प्रेम की परिभाषा
ज़िंदगी में एक बार किसी से
इतना प्रेम करना,
कि कोई पूछे—
“प्रेम क्या है?”
तो कोई परिभाषा याद न आए,
सिवाय आपके नाम के।
बस एक चेहरा,
एक याद,
एक आवाज़
गूँजती रहे मन में।
वो शख़्स,
जिसकी मौजूदगी ने प्रेम समझाया,
और जिसकी गैरमौजूदगी ने
उसे याद करना सिखाया।
जिसका नाम सुनते ही
दिल ठहर-सा जाए,
जिसकी आवाज़ के सिवा
कुछ सुनाई न दे,
और जिसकी याद के आगे
दुनिया की हर बात फीकी पड़ जाए।
शायद प्रेम यही है—
न कोई तर्क,
न कोई परिभाषा,
बस एक नाम,
एक चेहरा,
एक आवाज़…
और उम्र भर उसी का
मन में गूँजते रहना।
-रजनी
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