पितृसत्ता की स्त्री एजेंट
पितृसत्ता को बढ़ावा देने में
सिर्फ़ पुरुष ही जिम्मेदार नहीं,
कुछ स्त्रियाँ भी
बढ़-चढ़कर
उसकी एजेंट बनी हुई हैं।
कभी सास के रूप में,
कभी ननद के रूप में,
तो कभी किसी और रिश्ते का चेहरा लेकर,
वे उसी व्यवस्था को
आगे बढ़ाती हैं
जिसने कभी उन्हें भी बाँधा था।
बहू की आज़ादी उन्हें
बगावत लगती है,
उसकी आवाज़ उन्हें
बदतमीज़ी लगती है,
उसका सवाल करना
घर की इज़्ज़त के खिलाफ़ लगता है।
वे भूल जाती हैं—
जिस बेड़ियों को वे
आज बहू के पैरों में डाल रही हैं,
कल वही बेड़ियाँ
किसी और रूप में
उनकी बेटी के पास भी पहुँच सकती हैं।
पितृसत्ता की सबसे बड़ी जीत यही है—
कि वह केवल पुरुषों से नहीं,
कभी-कभी स्त्रियों के हाथों से भी
स्त्रियों पर शासन करवाती है।
और जब तक स्त्री
दूसरी स्त्री की दुश्मन बनी रहेगी,
तब तक बराबरी की लड़ाई
अधूरी ही रहेगी।
क्योंकि बदलाव तब आएगा
जब सास, ननद और बहू
एक-दूसरे की प्रतिद्वंद्वी नहीं,
एक-दूसरे की साथी बनेंगी।
— रजनी
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