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ख़ुद को आम मत कर लेना।

                
                                                         
                            पसंद की कीमत
                                                                 
                            

ख़ासकर जो चीज़ मुझे पसंद हो,
उसके भाव न बढ़ें, ऐसा हो ही नहीं सकता,
मैं उसे चाहूँ और उसकी कीमत न बढ़े,
शायद ऐसा कोई बाज़ार हो ही नहीं सकता।

बाज़ार में तो सुना था,
माँग बढ़े तो दाम बढ़ते हैं,
मगर रिश्तों की दुनिया में भी,
कुछ ऐसे ही हिसाब चलते हैं।

जिसे हम ख़ास बना देते हैं,
वो ख़ुद को अनमोल समझने लगता है,
हम जितना उसे चाहते हैं,
वो उतना ही भाव खाने लगता है।

हमारी चाहत को अक्सर,
वो अपनी जीत समझ बैठता है,
हमारी हर कोशिश को,
अपना अधिकार समझ बैठता है।

इसलिए प्रेम करो तो इतना,
कि प्रेम की गरिमा बनी रहे,
किसी को चाहो इस क़दर,
कि ख़ुद की भी अहमियत बनी रहे।

किसी की चाहत में ख़ुद को,
इस हद तक मत खो देना,
उसे ख़ास बनाते-बनाते,
ख़ुद को आम मत कर लेना।

याद रखना, रिश्तों में भी,
आत्मसम्मान ज़रूरी है,
किसी को चाहना ग़लत नहीं,
पर ख़ुद की कीमत भी ज़रूरी है।
-रजनी
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2 घंटे पहले

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