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न्याय नहीं मिलता तो

                
                                                         
                            न्याय नहीं मिलता तो
                                                                 
                            

जब न्याय नहीं मिलता,
तब मिलता है श्राप,
और उसकी कीमत
सिर्फ़ एक इंसान नहीं,
कई पीढ़ियाँ चुकाती हैं।

जिस दर्द को दबाकर
समझ लिया जाता है कि सब ख़त्म हो गया,
वही दर्द समय की राख से
फिर उठ खड़ा होता है।

अन्याय की नींव पर
कभी सुख का घर नहीं टिकता,
किसी की आह यूँ ही नहीं जाती,
वह इतिहास के पन्नों में
अपना हिसाब लिख जाती है।

इसलिए न्याय देर से मिले,
पर मिले ज़रूर—
क्योंकि जब न्याय मर जाता है,
तब उसका बोझ
पीढ़ियाँ उठाती हैं।

— रजनी
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48 मिनट पहले

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