आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

ज़िंदगी जैसी बाहर से दिखती है

                
                                                         
                            मेरी हँसी का राज़
                                                                 
                            

कुछ बेवकूफ़ लोग
मुझे हँसता हुआ देखकर
मुझ जैसी ज़िंदगी चाहते हैं,
उन्हें क्या पता—
इस मुस्कान तक पहुँचने में
मैंने कितने आँसू बहाए हैं।

जो आज मेरी हँसी देखते हैं,
उन्होंने मेरे कल नहीं देखे,
मेरी खामोश रातें नहीं देखीं,
मेरे भीतर के टूटने को नहीं देखा।

ज़िंदगी जैसी बाहर से दिखती है,
वैसी होती नहीं,
हर मुस्कुराता चेहरा
खुश होता नहीं।
-रजनी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर