मेरे हाथों की लकीरों का हुनर
मेरे हाथों की लकीरों में
शायद ये कैसी ख़ूबी है,
जो भी मेरे संपर्क में आता है,
वो ऊपर उठ जाता है।
मैंने जिसे अपना माना,
उसके रास्ते आसान होते गए,
उसके सपनों को पंख मिलते गए,
और उसके कदम
ऊँचाइयों की ओर बढ़ते गए।
मगर मेरी कहानी कुछ और रही,
जिसे उठाया, वो आसमान छू गया,
और मैं…
हर बार ज़मीन के नीचे
थोड़ी और धँसती गई।
अजीब हुनर है मेरी किस्मत का—
दूसरों के हिस्से में
मेरे हाथों से उजाला लिखती है,
और मेरे हिस्से में
अँधेरे छोड़ जाती है।
शायद मेरी लकीरों में
दूसरों को ऊँचा उठाने की ताकत है,
बस अफ़सोस…
मेरी अपनी ऊँचाई की
कोई लकीर नहीं।
-रजनी
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