मसला तनख़्वाह का था ही नहीं
शादी से पहले पति घबराता था,
कहता था—
“मेरी तनख़्वाह कम है,
पता नहीं ये लड़की मेरे साथ
कैसे गुज़ारा कर पाएगी।”
मैंने हँसकर कहा था—
“मुझे इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता,
तुम्हारी तनख़्वाह चाहे जितनी हो,
हम सब कुछ संभाल लेंगे,
मिलकर हर मुश्किल पार कर लेंगे।”
तब भरोसा बहुत था,
पैसे कम थे मगर हौसले बेहिसाब थे,
दो लोग साथ थे,
तो लगता था हर रास्ता आसान है।
आज सोचती हूँ तो अजीब लगता है,
तनख़्वाह तो आज भी उतनी बड़ी
मुश्किल नहीं बन रही,
मगर मुश्किलें इतनी बड़ी हो गई हैं
कि समझ नहीं आता—
आख़िर किया क्या जाए।
तब कमी पैसों की थी,
आज कमी शायद सुकून की है,
तब डर था कम कमाई का,
आज सवाल है—
इतनी परेशानियों में
ज़िंदगी कैसे निभाई जाए।
मैंने तो तब भी कहा था—
“तुम साथ रहना,
बाकी सब मैं संभाल लूँगी।”
काश उस वक़्त किसी ने बताया होता,
कि रिश्तों में सबसे कठिन
पैसों की कमी नहीं होती,
बल्कि तब होती है
जब साथ होते हुए भी
इंसान अकेला पड़ जाता है।
-रजनी
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