लड़की की विदाई बहुत कर ली,
अब लड़के की विदाई शुरू करो,
हम भी तो देखें—
कितना वो अपने घर को छोड़कर
नए घर में ढलते हैं।
हम भी तो देखें,
कितना ससुराल वालों को खुश रखते हैं,
कितनी उम्मीदों का बोझ उठाते हैं,
और कितनी बार ताने सुनकर
फिर भी मुस्कुराते हैं।
हम भी तो देखें,
गालियाँ मिलने के बाद
कितने रिश्ते निभाते हैं,
अपमान और मार सहकर
कितने दिन उस घर में टिक पाते हैं।
हम भी तो देखें,
घर-गृहस्थी बसाना
कितना आसान लगता है उन्हें,
जब हर त्याग, हर समझौता
उनसे ही माँगा जाए।
तभी शायद समझ आएगा—
घर बसाना सिर्फ़ औरत की ज़िम्मेदारी नहीं,
रिश्ता निभाना सिर्फ़ बहू का धर्म नहीं,
गृहस्थी दो लोगों से बनती है,
तो निभाने की ज़िम्मेदारी भी दोनों की होनी चाहिए।
-रजनी
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