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कुछ भी स्थिर नहीं

                
                                                         
                            कुछ भी स्थिर नहीं
                                                                 
                            

या तो आगे बढ़ो,
या फिर पीछे लौट जाओ,
कहीं तो जाना पड़ेगा,
क्योंकि यहाँ कुछ भी स्थिर नहीं।

हर दिन एक नया जीवन है,
हर पल एक नया द्वार,
या तो रोज़ नए जीवन में प्रवेश करो,
या पुराने में दबते जाओ बार-बार।

छोड़ दो उन चीज़ों को,
जो भय बनकर मन में रहती हैं,
भय केवल उस चीज़ से करो,
जिससे सच में भय करना चाहिए।

बाकी सब मोह-माया है,
सब समय के साथ बदल जाना है,
बस इतना कर लेना—
जब आईने में खुद को देखो,
तो अपनी नज़रों में
खुद को निर्दोष पाना है।

क्योंकि अंततः
दुनिया क्या कहती है, यह नहीं,
तुम अपने भीतर क्या देखते हो—
यही तुम्हारा सबसे बड़ा सत्य है।
-रजनी
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एक घंटा पहले

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