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कर्ण का दर्द

                
                                                         
                            कर्ण का दर्द
                                                                 
                            

कर्ण कैसे जिया होगा,
जिसे हराने
अपने भी आए,
पराए भी आए,
और स्वयं भगवान भी आए।

जिसने जीवन भर
अपनों की तलाश की,
मगर हर मोड़ पर
उसे अपनों ने ही ठुकराया।

जिसे जन्म देने वाली माँ ने
अपनाने से पहले छोड़ दिया,
और जिसने अपनाया,
वह भी उसकी जाति के आगे
समाज से लड़ता रहा।

जिसके सामने
भाई भी खड़े थे,
मित्रता भी कसौटी पर थी,
और धर्म के नाम पर
स्वयं भगवान भी खड़े थे।

फिर भी कर्ण ने
अपना सिर नहीं झुकाया,
हार सामने देखकर भी
अपना स्वाभिमान नहीं गंवाया।

शायद इसलिए
कर्ण की हार से अधिक
उसका अकेलापन याद रहता है,
क्योंकि कभी-कभी
इंसान युद्ध में नहीं हारता,
वह अपनों के बीच
अकेला पड़कर हार जाता है।

— रजनी
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एक दिन पहले

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