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हुस्न और दौलत से परे

                
                                                         
                            हुस्न और दौलत से परे
                                                                 
                            

हुस्न फीके पड़ जाते हैं
जहाँ मर्द उसूलों का पक्का हो,
चेहरे की चमक क्या मायने रखती है
जब चरित्र ही सच्चा हो।

दौलत दम तोड़ देती है
जहाँ औरत किरदार की सच्ची हो,
सोने-चाँदी की चमक भी छोटी पड़ जाती है
जब उसकी नीयत साफ़ और अच्छी हो।

रिश्ते हुस्न से नहीं,
उसूलों और किरदार से टिकते हैं,
दौलत और जवानी ढल जाती है,
मगर अच्छे संस्कार
उम्र भर साथ चलते हैं।
-रजनी
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56 मिनट पहले

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