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उम्मीद.........

                
                                                         
                            उस उम्मीदों से जी रहा हूं मैं,जिन उम्मीदों में लगता नही अब जान है
                                                                 
                            
फिर भी संघर्ष की राह न छोड़ पा रहा मैं
देखता हूं कब तक न बनता अपना पहचान है।
पिता का स्नेह,माँ का प्यार
फिर भी अधूरा सा चला जा रहा हूं मैं,
उस उम्मीद के लिए टिका हूं मैं और
उस उम्मीद से जी रहा हूं मैं।

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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8 वर्ष पहले

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