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क्या पता

                
                                                         
                            ज़िद,
                                                                 
                            
कर ली है

कितना निभाना है...
पता नहीं है

अकेले
बैठे रहना

वक़्त की नदी में
हाथ चलाना

याद,
कितने दिलबरों की... करूं मैं?

कभी, प्यार की ठोकर...
कभी, प्यास के ज़हर से लड़ूं मैं 🙃

क्या इतना गधा हूं
कि एक एग्जाम ना निकाल पाऊं?

अगर, आपमें है हिम्मत
मुझे इस ग़म के तालाब से निकालके बताओ!

'नहीं भाई, दुख में भी... हमने विजय प्राप्त की!'

'मन मारके, पढ़ने बैठे... फिर, चिंताएं छू हो गईं'

सुन ली है मैने...
बात,
बाद में समझूंगा...

कुछ पलों के लिए तो...
मैं और नहीं भटकूंगा 

नहीं हलावत के...
घूंट... गुटकूंगा...

नज़रों का ही...
मू लगाना...

बंद करना पड़ेगा!

-राहुल


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1 hour ago

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