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दो गत्ते, माथे के आजू-बाजू लगाने को...

                
                                                         
                            मेरी घबराहट,
                                                                 
                            
ऐ कागज़ ले ले तू?

ना
करूं गुनाह...

ना ग़म का कर्ज़ सर पे हो

हुस्न को मुबारक
ख़ूबसूरती उसकी

हम को मुबारक
ये लिखाई... सधी

एक-सी बीती... सदी...

'थोड़ा प्रयास'
तो ये बेख़ुदी करने से भी नहीं रोक सकती!

छोड़ूं प्यास...?
लो फिर हस्ती उन्हीं खयालों से घुटने लगी :(

मैं करिश्मा...
देखना चाहता हूं...

या मुझे,
अंजाम का नहीं मालूम...
मुझसे, संघर्ष करवा लो!

एक 'हर्ष की ढाल' लाके रख दो...

दो गत्ते, माथे के आजू-बाजू लगाने को...


राहुल





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4 घंटे पहले

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